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जन्माष्टमी क्यों मनाते हैं हम

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जन्माष्टमी क्यों मनाते हैं हम


हम कृष्ण जन्माष्टमी इसलिए मानते हैं कि इस दिन भगवन कृष्ण ने भारत भूमि पर अवतार धारण किया अर्थात जन्म लिया. हम जन्मदिन केवल उनका मनाते हैं जिन्होंने जनहित के लिए जन्म लिया और धर्म और न्याय की स्थापना की. इस संधर्भ में भगवन कृष्ण की लीलाएं और ओप्देश विलक्षण और पूजनीय हैं. उनका पूरा जीवन हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है. जरुरत है उनके जीवन और दर्शन को समझने की. उन्होंने बचपन में खेल खेल में सामाजिक सुधार किये. नारी जाती खुले में स्नान करके पीड़ित होने का कारण ना बने इसलिए उन्होंने चीर हरण की लीला की. बच्चों के दूध दही खाने में कंजूसी ना हो इसलिए उन्होंने माखन चोरी की लीला की. बच्चों का पेट काट कर दूध दही ना बेचा जावे इसलिए बाजार जानेवाली दही की हांडी फौडी. बड़े होने पर नारी जगत से वैधव्य का कलक मिटाने और पुनर्विवाह को बढ़ावा देने के लिए एक राक्षस की हजारों नारियों को संरक्षण और सम्मान दिया. अपनी अर्धांग्नी बनाया. कृष्ण को आदर्श मानते तो सती प्रथा से अनगिनत नारियों को जलने को बाध्य नहीं किया जाता.

ज्यादती सहन नहीं की और आत्मरक्षा का पाठ पढ़ाया . पूतना और कालिया जैसे राक्षसों को बचपन में ही मारा और युवा होते ही अन्याई कंश को मार डाला. बलराम भैय्या की शक्ति में अपने विवेक की दिशा दी. उन्होंने किसी निर्दोष और सज्जन को दण्डित नहीं होने दिया. भगवान् कृष्ण काली अंधियारी रात में आये और जग में ज्ञान की रौशनी फैलाते रहे और जन कल्याण की सुगंध फैलाई.

अवतरण के बाबत गीता के चौथे अध्याय में भगवान् कृष्ण ने खुद अपनी वाणी से बताया है कि वे कब और क्यों अवतार लेते हैं.

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

अर्थात भगवान् धर्म के अभ्युथान के लिए अवतार लेते हैं और साधुओं के अर्थात भले लोगों के कष्ट हरने और दुष्टों को विनाश करने के लिए आते हैं.

गीता में धर्म के अंतर्गत सभी अछे गुण और कर्तब्य आते हैं —जैसे सत्य — न्याय और कल्याण के लिए लड़ना और धरती में सुख चैन की बंसी बजने का वातावरन बनाना.
जब अर्जुन ने अपने परिवार के लोगों को मारने में असमर्थता दिखाई तो भगवान् ने उनको ज्ञान का प्रकाश दिया. मैथिलीशरण गुप्त ने उनके मार्गदर्शन को सुन्दर शब्दों में लिखा है—-

अधिकार खोकर बैठ रहना यह बड़ा दुष्कर्म है
न्यायार्थ अपने बंधू को भी दंड देना धर्म है.

भगवान् गीता में कहते हैं कि जो न्याय के साथ नहीं रहता उसे अन्याय के साथ माना जाएगा—–न्याय और अन्याय का संघर्ष तब तक जारी है जबसे दुनिया बनी है—-रास्ट्रकवि दिनकर जी ने महाभारत से प्रेरणा लेकर ठीक ही लिखा है—-

समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी अपराध.

महामानव भीष्म चीर हरण पर चुप रहे अर्थात तटस्थ रहे तो उनको तीरों की शैय्या पर सोना पड़ा. यह पहले भी हुवा और आज भी हो रहा है और होता रहेगा. हम लोग तटस्थ रहकर अन्याई लोगों को सत्ता सौंप देते है तो पांच साल अन्याय सहन करना पड़ता है. हजार पांच सौ में अपना वोट किसी भ्रस्ट नेता को बेच देते हैं और फिर अन्याय सहन करते हैं.

दुनिया में सबसे बड़ी चीज है न्याय और न्याय के लिए अर्जुन को महाभारत लड़ने हेतु प्रेरित किया और बाध्य किया.

भारत के लिए ही नहीं भगवान् कृष्ण का उपदेश पूरी दुनिया के लिए है. हमारा दुर्भाग्य है कि हम भगवान् कृष्ण के जन्म के दिन भूखे रह कर व्रत तो कर लेते हैं लेकिन उनके उपदेशों को ग्रहण करने का व्रत सभी जन नहीं लेते हैं. भगवान् कृष्ण का सबसे बड़ा उपदेश आज के अर्जुनों के लिए यही है कि ना अन्याय करो और ना अन्याय होने दो. भगवान् कृष्ण के उपदेशों को स्मरण करने और हमारे जीवन के महाभारत से ठीक से निपटना सीखने के लिए हम भगवान् कृष्ण का जन्म दिवस मनाते हैं.

दुनिया के इतिहास के सबसे बड़े विद्वान् अरस्तु ने भगवान् कृष्ण को जाना या नहीं यह मालूम नहीं फिर भी उनका अनुशरण किया है—

MAN IS THE MOST BEAUTIFUL CREATION OF GOD BUT BEREFT OF JUSTICE HE IS WORST THAN AN ANIMAL.

© आर एन अरविन्द आई ए एस रिटायर्ड दिनांक ३०—८—१८ थली राजस्थान